लेखक : महेश सिंह आज 12 जनवरी है, यानी राष्ट्रीय युवा दिवस। स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन। पूरा देश आज युवाओं की बात कर रहा है। वादों और दावों का दौर चल रहा है। कई मंचों से बड़े-बड़े भाषण दिए जा रहे होंगे कि भारत एक युवा देश है। हमारे पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है और यही आबादी हमें एकदिन 'विश्वगुरु' बनाएगी। यह सब सुनना बहुत अच्छा लगता है, कानों को सुकून देता है। लेकिन जब हम हकीकत से रूबरू होते हैं तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है। युवा दिवस का उत्सव मनाना है, मनाइए, लेकिन क्या केवल उत्सव मना लेने भर से आज के युवाओं दशा सुधर जाएगी? क्या हमारे पास ऐसी आँखें हैं जो उनकी मनोदशा को, आदतों को, मजबूरियों और निराशा को साफ-साफ देख सकें? स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए," लेकिन आज का युवा न तो ठीक से जाग पा रहा है और न ही उसे अपना लक्ष्य दिखाई दे रहा है। वह तो एक अजीब से धुंधलके में जी रहा है। सबसे पहले अगर हम आज के युवा की दिनचर्या और आदतों पर गौर करें, तो एक बहुत बड़ा बदलाव नजर आता है। उसके हाथ में किताबों की जगह स्मार...
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