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युवा दिवस पर आज के युवाओं की हालत

लेखक : महेश सिंह आज 12 जनवरी है, यानी राष्ट्रीय युवा दिवस। स्वामी विवेकानंद का जन्मदिन। पूरा देश आज युवाओं की बात कर रहा है। वादों और दावों का दौर चल रहा है। कई मंचों से बड़े-बड़े भाषण दिए जा रहे होंगे कि भारत एक युवा देश है। हमारे पास दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी है और यही आबादी हमें एकदिन 'विश्वगुरु' बनाएगी। यह सब सुनना बहुत अच्छा लगता है, कानों को सुकून देता है। लेकिन जब हम हकीकत से रूबरू होते हैं तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है। युवा दिवस का उत्सव मनाना है, मनाइए, लेकिन क्या केवल उत्सव मना लेने भर से आज के युवाओं दशा सुधर जाएगी? क्या हमारे पास ऐसी आँखें हैं जो उनकी मनोदशा को, आदतों को, मजबूरियों और निराशा को साफ-साफ देख सकें? स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए," लेकिन आज का युवा न तो ठीक से जाग पा रहा है और न ही उसे अपना लक्ष्य दिखाई दे रहा है। वह तो एक अजीब से धुंधलके में जी रहा है। सबसे पहले अगर हम आज के युवा की दिनचर्या और आदतों पर गौर करें, तो एक बहुत बड़ा बदलाव नजर आता है। उसके हाथ में किताबों की जगह स्मार...

समकालीन विद्रूपताओं के विरुद्ध एक निर्विवाद हस्तक्षेप

समीक्षक : डॉ. सुमित पी.वी.  समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में जहाँ एक ओर नितांत वैयक्तिक अनुभूतियों का बोलबाला है, वहीं पवन कुमार सिंह का नया कविता संग्रह 'निर्विवाद और अन्य कविताएं' एक सचेत सामाजिक-राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आता है । यह संग्रह केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि समय की शिला पर अंकित वे यथार्थवादी प्रश्न हैं, जिन्हें अक्सर हाशिए पर धकेल दिया जाता है। संग्रह की कविताओं में लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण के प्रति गहरी चिंता और तीखा असंतोष व्याप्त है। 'यह कैसा देश है' और 'बैठा लोकतंत्र मक्कार की गोद में' जैसी रचनाओं के माध्यम से कवि सत्ता के अहंकार, बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी पर सीधा और निर्भीक प्रहार करते हैं । कवि यहाँ केवल एक दृष्टा नहीं है, बल्कि वह व्यवस्था की विसंगतियों को बेनकाब करने वाला एक सजग नागरिक भी है । 'वंशवाद' और 'मेरे हिस्से का समाज' जैसी कविताएं सामाजिक संरचनाओं में व्याप्त भेदभाव और भाई-भतीजावाद की जड़ों को कुरेदती हैं। पवन कुमार सिंह की दृष्टि केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहती; वे प्रकृति को ए...

मानव स्वभाव की कुछ बातें

-महेश सिंह मानव स्वभाव को समझने के लिए दुनियां भर में सदियों से चिंतन-मनन होता आया है। इसके लिए न जाने कितनों ने अपना पूरा जीवन बिता दिया लेकिन यह एक ऐसी पहेली है जो आजतक अनसुलझी है। आप अपने खुद के अनुभव से ही समझें तो अक्सर हम अपने आसपास के लोगों के व्यवहार से हैरान हो जाते हैं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि कोई करीबी दोस्त अचानक बदल गया है, तो कभी हमें किसी की मुस्कुराहट के पीछे छिपे असली इरादे समझ नहीं आते। हम खुद से यह सवाल पूछते हैं कि आखिर लोग ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं ? इस तरह यह सवाल हमें काफी समय के लिए परेशान कर देता है। कई बार तो ऐसा होता है कि हमे समझना कुछ और चाहिए, समझ कुछ और लेते हैं। नतीजतन हमारा अपना खुद का व्यवहार ही बदलने लगता है। आइए, इस लेख के माध्यम से हम उन सभी पहलुओं को विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं जो हमें न केवल दूसरों को बल्कि खुद को भी बेहतर इंसान बनाने में मदद करते हैं। इस संदर्भ में सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात है- 'अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना'। हम मनुष्यों का सामान्य स्वभाव है कि हम खुद को बहुत तार्किक या समझदार मानते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि हम...

जनपक्षधर लेखन के उत्तरदायित्व का बोध कराता रहेगा रामदेव सिंह 'कलाधर' सम्मान : डॉ. रमाशंकर सिंह

रिपोर्ट : डॉ. रवीन्द्र पीएस     भलुआ | देवरिया दिनांक 28 दिसंबर 2025 को ग्राम भलुआ, जनपद देवरिया, उत्तर प्रदेश में 'स्व. विंध्याचल सिंह स्मारक न्यास द्वारा संचालित 'ग्रामीण पुस्तकालय' के स्थापना दिवस पर सम्मान समारोह, परिचर्चा और कविता पाठ का आयोजन किया गया।  कार्यक्रम के शुभारंभ में अतिथियों को असमिया गमछा और भारतीय संविधान की प्रस्तावना भेंट कर स्वागत किया गया। ग्रामीण पुस्तकालय के उदेश्य और इसकी संकल्पना को साकार करने की यात्रा पर प्रकाश डालते हुए न्यास के अध्यक्ष, परिवर्तन पत्रिका के सम्पादक एवं शिक्षक डॉ. महेश सिंह ने बताया कि मेरे जीवन में पुस्तकालयों ने क्रान्तिकारी भूमिका निभाई है। मैं इंटरमीडियट की पढ़ाई करने के बाद रोजी-रोटी की तलाश में गोवा गया था। वहीं गोवा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में एसी का काम करने के दौरान पढ़ने के प्रति मेरी जिज्ञासा बढ़ी, फलस्वरुप मैंने आगे के वर्षों में परास्नातक और पीएचडी की उपाधि हासिल की। आज झारखण्ड राज्य में शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहा हूँ। अपने अनुभवों, कठिनाइयों और संघर्षों को ध्यान में रखते हुए यह विचार आया कि पुस्तक...

भौगोलिक तथ्यों को कविता में समझाने की अद्भुत क़वायद

रामदेव सिंह 'कलाधर' (जन्मतिथि 23 फरवरी 1908, देहावसान 04 अप्रैल 1984) राष्ट्र कवि मैथलीशरण गुप्त समकालीन महत्वपूर्ण कवि हैं। उनकी रचनाओं में राष्ट्र कवि मैथलीशरण गुप्त का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है।  रामदेव सिंह 'कलाधर' ने हिंदी भाषा, भोजपुरी लोक भाषा और बाल साहित्य सम्बन्धी विपुल मात्रा में विविधतापूर्ण कविताएं लिखी हैं। 23 से अधिक कविता संग्रह हिंदी भाषा में, भोजपुरी लोक साहित्य में छः से अधिक और बाल साहित्य में 12 से अधिक उनके संग्रह हैं! पांच भागों में उन्होंने भूगोल जैसे जटिल और तथ्यपरक विषय को कविता शैली में लिखी है जो भूगोल जैसे विषय में बच्चों की समझ विकसित करने और उनके लर्निंग आउटकम में सहायक है। भूगोल कलाधर (भाग एक से पांच तक) एक अत्यंत मौलिक और शिक्षाप्रद कृति है, जो भूगोल जैसे तथ्यपरक विषय को कविता के रसपूर्ण माध्यम से प्रस्तुत करती है। स्व. रामदेव सिंह 'कलाधर' एक कुशल शिक्षक थे। साथ ही साथ वे उच्च कोटि के कवि और समालोचक भी थे। इस पुस्तक की समीक्षा करते समय सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह उभर कर आता है कि लेखक ने कठिन भौगोलिक आँकड़ों और विवरणों को प...

इश्क, इंक़लाब और इंसानियत के शैलेन्द्र

सिनेमा, साहित्य कला के वह माध्यम हैं जिसके ज़रिये समाज के यथार्थ को सामने लाया जाता है। हालांकि सिनेमा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य मनोरंजन भी होता है लेकिन उसके साथ देखने वाले दर्शकों को अगर मानव जीवन के विभिन्न रूपों का साक्षात्कार कराया जाए और समाज से परिचित कराया जाता है तो यह सिनेमा की अप्रतिम सफलता भी होगी। साथ ही सिनेमा में हम कई बार देखते हैं कि उसके गीत के बोल समय के दायरे को लांघ कर युग सत्य के रूप में प्रतिष्ठित हो जाते हैं। साहिर लुधियानवी हिन्दी या ये कहें कि भारतीय सिनेमा के उन चंद गीतकारों में से हैं जिन्होंने अपने गीतों के बोल के माध्यम से समाज, मानव जीवन-चेतना के कई रूपों को अभिव्यक्त किया है, स्वर दिया है। इश्क, इंक़लाब और इंसानियत के शब्दशिल्पी  के रूप में शैलेन्द्र को याद किया जाए तो कोई गुरेज नहीं हैं. शैलेन्द्र जिसकी गीत-धारा ने हिंदी सिनेमा को मानवीय संवेदना, सामाजिक न्यायबोध और दार्शनिक गहराई से जोड़ने में एक सफल भूमिका निभाई है। वे अपने गीतों में केवल गीतकार के रूप में  नहीं, बल्कि आम आदमी की तरफ़ से बोलने वाले ‘लोक–दर्शनिक’ के रूप में उभरकर सामने आते हैं,...

मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया

हिंदी फ़िल्म संगीत का इतिहास केवल मनोरंजन की कथा नहीं, बल्कि भारतीय समाज के अंतःसंसार का जीवंत दस्तावेज़ भी है। इस इतिहास में कुछ गीतकार ऐसे हुए जिन्होंने प्रेम, विरह और सौंदर्य के पार जाकर मनुष्य, व्यवस्था और सत्ता से प्रश्न किए। इन्हीं में सबसे तेजस्वी नाम है साहिर लुधियानवी। उनके फ़िल्मी गीत केवल धुनों के साथ बँधी भावनाएँ नहीं, बल्कि प्रगतिशील चेतना के घोष-पत्र हैं। उन्होंने सिनेमा के लोकप्रिय माध्यम को सामाजिक आलोचना की धार प्रदान की और शोषण, युद्ध, वर्गभेद, स्त्री-पीड़ा और मानवीय गरिमा जैसे विषयों को गीतों के केंद्र में रखा। चित्र : गूगल से साभार         साहिर लुधियानवी का साहित्यिक संस्कार प्रगतिशील लेखक संघ की विचारधारा से गहराई से जुड़ा हुआ था। उर्दू शायरी की परंपरा में पले-बढ़े साहिर ने रोमैंटिक भाषा को सामाजिक यथार्थ से जोड़ा। उनके लिए कविता सत्ता-प्रतिष्ठानों की शोभा बढ़ाने का साधन नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने का शस्त्र थी।लाहौर में साहिर ने ‘अदब-ए-लतीफ’, ‘शाहकार’ और ‘सवेरा’ जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया, लेकिन प्रगतिशील विचारों के कारण पाकिस्ता...

आप जैसा कोई : जितने तुम उतनी मैं का द्वंद्व

फिल्में समाज का सिर्फ अहम हिस्सा हैं, ये सिर्फ हमारा मनोरंजन नहीं करती बल्कि हमें बहुत कुछ सिखाती भी हैं। जीवन की  असंख्य घटनाओं एवं बनते-बिगड़ते  संबंधों आदि  महत्वपूर्ण विषयों पर बनी फिल्में हमें सिर्फ सोचने के लिए प्रेरित नहीं करती बल्कि जीवन को जीने का सलीका भी सीखा जाती हैं। अन्य कला माध्यमों से विशिष्ट यह विधा तकनीक से लैश दृश्य और श्रव्य दोनों माध्यमों में होने की वजह से  देखने वालों  को ज्यादा प्रभावित करती है। चित्र : गूगल से साभार एक समय सिनेमा मनोरंजन का सबसे बड़ा माध्यम था। फैंटेसी,एक्शन,लटके -झटके, गानों से भरपूर फिल्में दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच लाती थीं। टिकट की लंबी कतारें। ब्लैक में टिकट खरीदने का जुनून सब कुछ था।पर हाल के वर्षों में फिल्म और दर्शक दोनों के स्वाद में थोड़ा बदलाव आया है। दर्शकों का एक बड़ा हिस्सा अब जीवन के निकट के विषयों पर बनी फिल्मों में रूचि लेने लगा है। सबसे अच्छी बात यह है कि इन दिनों भारत में  बनने वाली कई फिल्में विशुद्ध रूप से जीवन के ज्यादा करीब हैं। ऐसी फिल्मों को पर्दें पर या जादू के पिटारे को खोलते हुए मोबाइ...

समाज की स्मृति और अनुभवों का सार 'काका के कहे किस्से'

लोककथाएँ, छोटे-छोटे किस्से और कहावतें किसी भी समाज की स्मृति और अनुभवों का सार होती हैं। वे न केवल मनोरंजन का साधन बनती हैं बल्कि पीढ़ियों के अनुभव, मूल्य और जीवन-दर्शन को संप्रेषित करने का भी काम करती हैं। "काका के कहे किस्से" इसी परंपरा को आगे बढ़ाने का एक ईमानदार और सहज प्रयास है। पुस्तक के लेखक अमित कुमार मल्ल ने यहां न तो मौलिकता का दावा किया है और न ही किसी साहित्यिक प्रयोगवाद की दुहाई दी है। प्रस्तावना में लेखक का यह कथन विशेष ध्यान खींचता है कि “मैं यह दावा नहीं करता कि किस्से मौलिक हैं और न ही इनमें मौलिकता ढूँढी जानी चाहिए। इनमें बहुत से ऐसे किस्से व कहावतें हैं, जिन्हें आप पहले कहीं पढ़ चुके होंगे या सुन चुके होंगे। किस्से से अधिक महत्वपूर्ण है किस्से को पेश किए जाने का ढंग और उससे निकला संदेश।” इस कथन में लेखक का उद्देश्य साफ झलकता है कि वे इन कहानियों को ‘बौद्धिक संपदा’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘सामूहिक लोक-संपत्ति’ के रूप में देख रहे हैं। यहां मौलिकता का आग्रह छोड़कर, संदेश की पुनर्प्रस्तुति पर जोर दिया गया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया है कि इन किस्...